Guillain-Barré syndrome : लक्षण, जाँच और इलाज

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GBS यानी Guillain-Barré Syndrome एक ऐसी स्थिति है जो अक्सर किसी संक्रमण के बाद होती है, जैसे कि इन्फ्लुएंजा या पेट का फ्लू। कभी-कभी टीकाकरण के बाद भी इसका कनेक्शन देखा गया है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से नसों पर हमला करने लगता है, जिससे यह समस्या शुरू होती है। GBS के मुख्य लक्षणों में सबसे पहले कमजोरी आती है जो पैरों से शुरू होकर धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्से तक फैलती है। इसके अलावा, हाथ और पैरों में झनझनाहट या जलन का अहसास हो सकता है, मांसपेशियों में दर्द, और गंभीर मामलों में पैरालिसिस या सांस लेने में कठिनाई भी हो सकती है।

GBS की पुष्टि के लिए कई जांच की जाती हैं। लम्बर पंक्चर एक महत्वपूर्ण जांच है, जिसमें रीढ़ की हड्डी से तरल पदार्थ का सैंपल लिया जाता है। GBS में इस तरल में प्रोटीन की मात्रा बढ़ी हुई पाई जाती है। इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) और नर्व कंडक्शन स्टडीज नसों और मांसपेशियों के कार्य को परखने के लिए की जाती हैं। इन जांचों से डॉक्टर यह निर्धारित करते हैं कि क्या GBS ही समस्या का कारण है।

इस स्थिति के उपचार में मुख्य रूप से इम्यूनोग्लोब्युलिन थेरेपी (IVIG) या प्लाज्मा एक्सचेंज (प्लास्मफेरेसिस) शामिल हैं। IVIG में इम्यून सिस्टम को शांत करने के लिए एंटीबॉडीज दी जाती हैं, जबकि प्लास्मफेरेसिस में खून से हानिकारक एंटीबॉडीज को निकाला जाता है। साथ ही, दर्द प्रबंधन, फिजियोथेरेपी और जरूरत पड़ने पर सांस लेने की सहायता जैसी सहायक देखभाल भी महत्वपूर्ण है।

GBS का प्रोग्नोसिस यानी भविष्य की संभावना भिन्न होती है। बहुत से लोग ठीक हो जाते हैं, लेकिन पूरी रिकवरी में महीने या साल लग सकते हैं। कुछ मामलों में, थोड़ी कमजोरी या सुन्नपन बना रह सकता है। बहुत ही दुर्लभ मामलों में GBS बहुत गंभीर हो सकता है, लेकिन उचित उपचार के साथ, पूर्ण रिकवरी की संभावना बढ़ जाती है। यह ज़रूरी है कि अगर कोई GBS के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता ली जाए

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